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जय सनातन अखिल भारतीय सनातन हिन्दू महासभा के उद्देश्यों और आप सभी ऊर्जावान पदाधिकारियों डॉ. रेखा निषाद हरि प्रसाद द्विवेदी सुधीर त्यागी संकल्प |

पुष्पेंद्र कुमार संपादक // गौतम बुद्ध नगर यूपी

सनातन का शंखनाद हिमालय की तलहटी में बसे एक आश्रम की पावन धरा पर, जहाँ गंगा की कल-कल और मंत्रों की गूँज एक साथ सुनाई देती थी, वहाँ एक विशेष विचार-गोष्ठी का आयोजन हुआ। यह मात्र एक बैठक नहीं, बल्कि अखिल भारतीय सनातन हिन्दू महासभा के भविष्य की नींव थी।

 

राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रेखा निषाद ने सभा का शुभारंभ करते हुए कहा, “सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह वैज्ञानिक पद्धति है जो पूरी दुनिया को एक परिवार (वसुधैव कुटुंबकम) मानती है। हमें हर घर तक इस संस्कार को पहुँचाना है।”

राष्ट्रीय महासचिव हरि प्रसाद द्विवेदी जी ने संगठन की शक्ति पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन का ढांचा केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर सेवा और एकता के रूप में दिखना चाहिए। उनके पास हर गाँव और हर नगर तक पहुँचने का एक स्पष्ट रोडमैप था।

राष्ट्रीय संरक्षक सुधीर त्यागी जी ने चर्चा को एक गहरा विस्तार दिया। उन्होंने कहा, “विस्तार तब स्थायी होता है जब हमारी जड़ें मजबूत हों। हमारे साधु-संत हमारी संस्कृति के प्रकाश स्तंभ हैं। उनके सानिध्य और मार्गदर्शन में ही हम युवाओं को अपनी लुप्त होती परंपराओं से जोड़ सकते हैं।”

संस्कृति विस्तार के तीन स्तंभ

चर्चा के बाद तीन मुख्य बिंदुओं पर सहमति बनी, जिन्हें संगठन का मूल मंत्र माना गया:

* संत-शक्ति का सम्मान: साधु-संतों के ज्ञान को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना और उनके आश्रमों को संस्कार केंद्रों के रूप में विकसित करना।

* संगठन का लोकव्यापीकरण: सुधीर त्यागी जी के मार्गदर्शन में संगठन का विस्तार इस तरह करना कि समाज का हर वर्ग खुद को ‘सनातन’ का रक्षक महसूस करे।

* सांस्कृतिक पुनरुत्थान: आधुनिकता के शोर में दबी हमारी प्राचीन पद्धतियों, आयुर्वेद और योग को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना।

उपसंहार

उस दिन सूर्यास्त के समय जब गंगा आरती हुई, तो इन तीनों दिग्गजों के मन में एक ही संकल्प था— “धर्मो रक्षति रक्षितः”। अखिल भारतीय सनातन हिन्दू महासभा अब केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुकी थी, जिसका उद्देश्य भारत की आत्मा को जगाना और विश्व को पुनः सनातन मार्ग दिखाना था।

> “जहाँ एकता है, वहीं धर्म सुरक्षित है और जहाँ धर्म सुरक्षित है, वहीं विजय निश्चित है।

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